संसय सोक निबिड़ तम भानुहि

चौपाई ४, दोहा ३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥ जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥ ४ ॥

अर्थ

संशय और शोक रूपी घने अन्धकार के नाश करने वाले श्रीरामरूप सूर्य को भजो। राक्षस रूपी घने वन को जलाने वाले श्रीरामरूप अग्नि को भजो। श्रीजानकीजी समेत श्रीरघुबीर को क्यों नहीं भजते, जो जन्म-मृत्यु के भय का नाश करने वाले हैं?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।

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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन