सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी

चौपाई १, दोहा ३४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥ जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥ १ ॥

अर्थ

प्रभु के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीर से स्तुति करने लगे--हे भगवन्‌! आपकी जय हो। आप अनंत, अनामय, अनघ, अनेक (सब रूपों में प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।

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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन