मुनि मन मानस हंस निरंतर
मुनि मन मानस हंस निरंतर
चौपाई ४, दोहा ३५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥ रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥ ४ ॥
अर्थ
हे मुनियों के मनरूपी मानसरोवर में निरन्तर निवास करनेवाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुल के केतु, वेदमर्यादा के रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [-रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन