धवल धाम ऊपर नभ चुंबत
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत
चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥ बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥ ४ ॥
अर्थ
उज्ज्वल महल ऊपर आकाश को चूम रहे हैं। महलों पर के कलश [अपने दिव्य प्रकाश से] मानो सूर्य, चन्द्रमा की भी निन्दा करते हैं। [महलों में] बहुत-सी मणियों से रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहे हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन