बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं
छन्द, दोहा २९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥ बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥
अर्थ
अनुपम बावियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुन्दर सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनि तक मोहित हो जाते हैं। [तालाबों में] अनेक रंगों के कमल खिल रहे हैं, अनेक पक्षी कूज रहे हैं और भौरे गुंजार कर रहे हैं। [परम] रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियों की [सुन्दर बोली से] मानो राह चलने वालों को बुला रहे हैं॥
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का छन्द, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन