जय निर्गुन जय जय गुन सागर
जय निर्गुन जय जय गुन सागर
चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥ जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥ २ ॥
अर्थ
हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुण के समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुख के धाम, [अत्यन्त] सुन्दर और अति नागर (चतुर) हैं। हे इंदिरा-रमन! आपकी जय हो। हे भूधर! आपकी जय हो। आप अनुपम, अज, अनादि और शोभा के भण्डार हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन