रूप धरें जनु चारिउ बेदा
रूप धरें जनु चारिउ बेदा
चौपाई ३, दोहा ३२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥ आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ ३ ॥
अर्थ
मानो चारों वेद ही बाल-रूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजी की चरित्र-कथा होती है, वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन