हनुमानजी द्वारा भरतजी का प्रश्न और श्रीरामजी का उपदेश
भरतजी हनुमानजी के माध्यम से अपने विनम्र प्रश्न प्रभु के समक्ष रखते हैं। श्रीरामजी उनके उत्तर में धर्म, भक्ति और जीवन के मर्म का उपदेश देते हैं।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण ८ / २१
प्रकरण पाठ
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥ सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥ ४ ॥
अर्थ:
[भगवान ने कहा--] हनुमानजी! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरत और मुझमें कुछ भी अन्तर है क्या? प्रभु के वचन सुनकर भरतजी ने उनके चरण पकड़ लिये [और कहा--] हे नाथ! हे शरणागत की पीड़ा हरनेवाले! सुनिये।
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥ संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥ १ ॥
अर्थ:
तथापि हे कृपानिधान! मैं आपसे एक धृष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवक को सुख देनेवाले हैं [इससे मेरी धृष्टताको क्षमा कीजिये और मेरे प्रश्न का उत्तर देकर सुख दीजिये]। हे रघुनाथजी! वेद-पुराणों ने संतों की महिमा बहुत प्रकार से गायी है।
श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥ सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥ २ ॥
अर्थ:
आपने भी अपने श्रीमुख से उनकी बड़ाई की है और उन पर प्रभु (आप) का प्रेम भी बहुत है। हे प्रभो! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। आप कृपा के समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञान में अत्यन्त निपुण हैं।
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥ काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥ ४ ॥
अर्थ:
संत और असंतों की करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दन का आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दन को काटती है [क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षों को काटना है]; किन्तु चन्दन [अपने स्वभाववश] अपना गुण देकर उसे (काटनेवाली कुल्हाड़ी को) सुगन्ध से सुवासित कर देता है।
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥ सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥ १ ॥
अर्थ:
संत विषयों में लम्पट (लिप्त) नहीं होते, शील और सद्गुणों की खान होते हैं। उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता है। वे [सबमें, सर्वत्र, सब समय] समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है, वे मद से रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भय का त्याग किये हुए रहते हैं।
कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया॥ सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥ २ ॥
अर्थ:
उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनों पर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्म से मेरी निष्कपट (विशुद्ध) भक्ति करते हैं। सब को सम्मान देते हैं, पर स्वयं मान रहित होते हैं। हे भरत! वे प्राणी (संतजन) मेरे प्राणों के समान हैं।
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन॥ सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री॥ ३ ॥
अर्थ:
उनको कोई कामना नहीं होती। वे मेरे नाम के परायण होते हैं। शान्ति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नता के घर होते हैं। उनमें शीतलता, सरलता, सब के प्रति मित्रभाव और ब्राह्मण के चरणों में प्रीति होती है, जो धर्मों को उत्पन्न करनेवाली है।
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर॥ सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं॥ ४ ॥
अर्थ:
हे तात! ये सब लक्षण जिसके हृदय में बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना। जो शम (मन के निग्रह), दम (इन्द्रियों के निग्रह), नियम और नीति से कभी विचलित नहीं होते और मुख से कभी कठोर वचन नहीं बोलते।
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥ तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि घालइ हरहाई॥ १ ॥
अर्थ:
अब असंतों (दुष्टों) का स्वभाव सुनो; कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिये। उनका संग सदा दुःख देनेवाला होता है। जैसे हरहाई (बुरी जाति की) गाय कपिला (सीधी और दुधार) गाय को अपने संग से नष्ट कर डालती है।
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥ जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥ २ ॥
अर्थ:
दुष्टों के हृदय में बहुत अधिक संताप रहता है। वे पराई सम्पत्ति (सुख) देखकर सदा जलते रहते हैं। वे जहाँ कहीं दूसरे की निंदा सुन पाते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्ते में पड़ी निधि (खजाना) पा ली हो।
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥ बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥ ४ ॥
अर्थ:
उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है। झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है (अर्थात् वे लेने-देने के व्यवहार में झूठ का आश्रय लेकर दूसरों का हक मार लेते हैं अथवा झूठी डींग हाँका करते हैं कि हमने लाखों रुपये ले लिये, करोड़ों का दान कर दिया। इसी प्रकार खाते हैं चने की रोटी और कहते हैं कि आज खूब माल खाकर आये। अथवा चबेना चबाकर रह जाते हैं और कहते हैं हमें बढ़िया भोजन से वैराग्य है, इत्यादि। मतलब यह कि वे सभी बातों में झूठ ही बोला करते हैं।) जैसे मोर [बहुत मीठा बोलता है, परन्तु उस] का हृदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान् विषैले साँपों को भी खा जाता है। वैसे ही वे भी ऊपर से मीठे वचन बोलते हैं [परन्तु हृदय के बड़े ही निर्दयी होते हैं]।
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न॥ काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥ १ ॥
अर्थ:
लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है (अर्थात् लोभ ही से वे सदा घिरे हुए रहते हैं)। वे पशुओं के समान आहार और मैथुन के ही परायण होते हैं, उन्हें यमपुर का भय नहीं लगता। यदि किसी की बड़ाई सुन पाते हैं, तो वे ऐसी [दुःखभरी] साँस लेते हैं मानो उन्हें जूड़ी आ गयी हो।
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥ करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा॥ ३ ॥
अर्थ:
वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसी को नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, [साथ ही अपने संग से] दूसरों को भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरों से द्रोह करते हैं। उन्हें न संतों का संग अच्छा लगता है, न भगवान् की कथा ही सुहाती है।
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥ बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥ ४ ॥
अर्थ:
वे अवगुणों के समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी (रागयुक्त), वेदों के निन्दक और जबर्दस्ती पराए धन के स्वामी (लूटनेवाले) होते हैं। वे दूसरों से द्रोह तो करते ही हैं; परन्तु ब्राह्मण-द्रोह विशेषता से करते हैं। उनके हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे [ऊपर से] सुन्दर वेष धारण किये रहते हैं।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥ निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥ १ ॥
अर्थ:
हे भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। हे तात! समस्त पुराणों और वेदों का यह निर्णय (निश्चित सिद्धान्त) मैंने तुमसे कहा है, इस बात को पण्डित लोग जानते हैं।
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥ करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥ २ ॥
अर्थ:
मनुष्य का शरीर धारण करके जो लोग दूसरों को दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्यु के महान् संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसी से उनका परलोक नष्ट होता है।
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता॥ अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने॥ ३ ॥
अर्थ:
हे भाई! मैं उनके लिये कालरूप (भयंकर) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मों का [यथायोग्य] फल देनेवाला हूँ! ऐसा विचारकर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार [के प्रवाह] को दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं।
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥ संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥ ४ ॥
अर्थ:
इसीसे वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मों को त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियों के नायक मुझको भजते हैं। [इस प्रकार] मैंने संतों और असंतों के गुण कहे। जिन लोगों ने इन गुणों को समझ रखा है, वे जन्म-मृत्यु के चक्कर में नहीं पड़ते।
नित नव चरित देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं॥ सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं॥ ३ ॥
अर्थ:
मुनि यहाँ से नित्य नये-नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रह्मलोक में जाकर सब कथा कहते हैं। ब्रह्माजी सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं [और कहते हैं--] हे तात! बार-बार श्रीरामजी के गुणों का गान करो।
सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं॥ सुनि गुन गान समाधि बिसारी। सादर सुनहिं परम अधिकारी॥ ४ ॥
अर्थ:
सनकादि मुनि नारदजी की सराहना करते हैं। यद्यपि वे (सनकादि) मुनि ब्रह्मनिष्ठ हैं, परन्तु श्रीरामजी का गुणगान सुनकर वे भी अपनी ब्रह्मसमाधि को भूल जाते हैं और आदरपूर्वक उसे सुनते हैं। वे [रामकथा सुनने के] श्रेष्ठ अधिकारी हैं।