सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय

चौपाई ४, दोहा ३४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय॥ द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। हृदि बसि राम काम मद गंजय॥ ४ ॥

अर्थ

आप सर्वरूप हैं, सब में व्याप्त हैं और सबके हृदय-रूपी घर में सदा निवास करते हैं; [अतः] आप हमारा परिपालन कीजिये। [राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि] द्वंद्व, विपत्ति और भव-फंद को काट दीजिये। हृदय में बसकर, हे राम! काम और मद का नाश कर दीजिये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन