बहु बासना मसक हिम रासिहि
बहु बासना मसक हिम रासिहि
चौपाई ५, दोहा ३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥ मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥ ५ ॥
अर्थ
बहुत-सी वासनाओं रूपी मच्छरों को नाश करने वाले श्रीरामरूप हिमराशि (बर्फ के ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजी को भजो। मुनियों को आनन्द देने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले और तुलसीदास के उदार (दयालु) स्वामी श्रीरामजी को भजो।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन