रामराज्य का वर्णन

रामराज्य में धर्म, न्याय, करुणा और समृद्धि का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। प्रजा सुखी है, प्रकृति संतुलित है, और जीवन में शांति का प्रकाश व्याप्त है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण ६ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥ बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के राज्य पर प्रतिष्ठित होने पर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसी से बैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से सब की विषमता मिट गयी।

दोहा

बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥ २० ॥

अर्थ:

सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म में तत्पर हुए सदा वेद-मार्ग पर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बात का भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है।

दोहा 21 के अंतर्गत
चौपाई

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥ १ ॥

अर्थ:

“राम-राज” में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

चौपाई

चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥ राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥ २ ॥

अर्थ:

धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत् में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी राम-भक्ति के परायण हैं और सभी परम गति (मोक्ष) के अधिकारी हैं।

चौपाई

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ ३ ॥

अर्थ:

छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही है।

चौपाई

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥ सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥ ४ ॥

अर्थ:

सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणों के ज्ञाता और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ हैं, कपट-सयानी किसी में नहीं है।

दोहा

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं। काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥ २१ ॥

अर्थ:

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये। श्रीराम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत् में काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते (अर्थात् इनके बन्धन में कोई नहीं है)।

दोहा 22 के अंतर्गत
चौपाई

भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥ भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥ १ ॥

अर्थ:

अयोध्या में श्रीरघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) -वाली पृथ्वी के एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है।

चौपाई

सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥ सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥ २ ॥

अर्थ:

बल्कि प्रभु की उस महिमा को समझ लेने पर तो यह कहने में [कि वे सात समुद्रों से घिरी हुई सप्तद्वीपमयी पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट् हैं] उनकी बड़ी हीनता होती है। परन्तु हे गरुड़जी! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीला में बड़ा प्रेम मानते हैं।

चौपाई

सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला॥ राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा॥ ३ ॥

अर्थ:

क्योंकि उस महिमा को भी जानने का फल यह लीला (इस लीला का अनुभव) ही है, इन्द्रियों का दमन करनेवाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं। राम-राज्य की सुख-सम्पत्ति का वर्ण शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते।

चौपाई

सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥ एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी॥ ४ ॥

अर्थ:

सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्म से पति का हित करनेवाली हैं।

दोहा

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज। जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज॥ २२ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचनेवालों के नृत्यसमाज में है और “जीतो” शब्द केवल मन के जीतने के लिये ही सुनायी पड़ता है (अर्थात् राजनीतिमें शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदिको दमन करने के लिये साम, दान, दण्ड और भेद--ये चार उपाय किये जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिये 'जीतो' शब्द केवल मन के जीतने के लिये ही कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिये दण्ड किसी को नहीं होता; 'दण्ड' शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहनेवाले दण्ड के लिये ही रह गया है। तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गयी; 'भेद' शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिये ही कामों में आता है।)

दोहा 23 के अंतर्गत
चौपाई

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥ खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह [वैर भूलकर] एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है।

चौपाई

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा॥ सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा॥ २ ॥

अर्थ:

पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँति के पशुओं के समूह वन में निर्भय विचरते और आनन्द करते हैं। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौरे पुष्पों का रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं।

चौपाई

लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥ ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥ ३ ॥

अर्थ:

बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुग की करनी (स्थिति) हो गयी।

चौपाई

प्रगटीं गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी॥ सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥ ४ ॥

अर्थ:

समस्त जगत् के आत्मा भगवान् को जगत् का राजा जानकर पर्वतों ने अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं।

चौपाई

सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥ सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥ ५ ॥

अर्थ:

समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरों के द्वारा किनारों पर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलों से परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के विभाग (अर्थात् सभी प्रदेश) अत्यन्त प्रसन्न हैं।

दोहा

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज। मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥ २३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के राज्य में चन्द्रमा अपनी [अमृतमयी] किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनी आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही] जल देते हैं।

दोहा 24 के अंतर्गत
चौपाई

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥ श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामजी ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणों को अनेक दान दिये। श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्ग के पालनेवाले, धर्म की धुरी को धारण करनेवाले, [प्रकृतिजन्य सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणों से अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्र के समान हैं।

चौपाई

पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता॥ जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई॥ २ ॥

अर्थ:

शोभा की खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पति के अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्रीरामजी की प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं।

चौपाई

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥ निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥ ३ ॥

अर्थ:

यद्यपि घर में बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि [स्वामी की सेवा का महत्त्व जाननेवाली] श्रीसीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं।

चौपाई

जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥ कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवा की विधि को जाननेवाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है।

चौपाई

उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता॥ ५ ॥

अर्थ:

(शिवजी कहते हैं--) हे उमा! जगदंबा रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओं से वन्दित और सदा अनिन्दित (सर्वगुणसम्पन्न) हैं।

दोहा

जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ। राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ॥ २४ ॥

अर्थ:

देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, वे ही अपने [महामहिम] स्वभाव को छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी के चरणारविंद में प्रीति करती हैं।

दोहा 25 के अंतर्गत
चौपाई

सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई॥ प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं॥ १ ॥

अर्थ:

सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामजी के चरणों में उनकी अत्यन्त अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभु का मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्रीरामजी कभी हमें कुछ सेवा करने को कहें।

चौपाई

राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती॥ हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी भी भाइयों पर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकार की नीतियाँ सिखलाते हैं। नगर के लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकार के देवदुर्लभ (देवताओं को भी कठिनता से प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं।