भव बारिधि कुंभज रघुनायक

चौपाई २, दोहा ३५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥ मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥ २ ॥

अर्थ

हे रघुनाथजी! आप भव-सागर को सुखानेवाले अगस्त्य के समान हैं। आपकी सेवा करने में आप सुलभ हैं तथा सब सुखों के देनेवाले हैं। हे दीनबन्धु! मन से उत्पन्न दारुण दुःखों का नाश कीजिये और [हममें] समता का विस्तार कीजिये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।

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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन