आस त्रास इरिषादि निवारक
आस त्रास इरिषादि निवारक
चौपाई ३, दोहा ३५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥ भूप मौलि मनि मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥ ३ ॥
अर्थ
आप [विषयों की] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्य के विस्तार करनेवाले हैं। हे राजाओं के शिरोमणि एवं पृथ्वी के भूषण श्रीरामजी ! संसृति (जन्म-मृत्यु के प्रवाह)-रूपी नदी के लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन