कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई
चौपाई १, दोहा ३३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥ मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥ १ ॥
अर्थ
फिर हनुमानजी सहित तीनों भाइयों ने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजी की अतुलनीय छबि देखकर उसी में मग्र हो गये। वे मन को रोक न सके।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन