काल कराल ब्याल खगराजहि

चौपाई ३, दोहा ३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥ लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥ ३ ॥

अर्थ

कालरूपी भयानक सर्प के भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जी को भजो। निष्काम भाव से प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजी को भजो। लोभ-मोहरूपी हरिनों के समूह के नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरात को भजो। कामदेवरूपी हाथी के लिये सिंह रूप तथा सेवकों को सुख देनेवाले श्रीरामजी को भजो।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।

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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन