जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं
चौपाई १, दोहा ३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥ भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥ १ ॥
अर्थ
लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजी के गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरे को यही सीख देते हैं कि शरणागत का पालन करने वाले श्रीरामजी को भजो; शोभा, शील, रूप और गुणों के धाम श्रीरघुनाथजी को भजो।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन