ज्ञान और भक्ति का निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्ति की महान महिमा
यहाँ ज्ञान और भक्ति के स्वरूप का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। ज्ञानदीपक का प्रतीक लेकर बताया गया है कि अंततः भक्ति ही साधक को सहजता से प्रभु तक पहुँचाती है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण १८ / २१
प्रकरण पाठ
ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना॥ पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती॥ ८ ॥
अर्थ:
हे हरिजाना! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान-ये सब पुरुष हैं; पुरुष का प्रताप सब प्रकार से प्रबल होता है। अबला (माया) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति (जन्म) से ही जड़ (मूर्ख) होती है।
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥ ३ ॥
अर्थ:
तभीसे जीव संसारी (जन्मने-मरनेवाला) हो गया। अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणों ने बहुत-से उपाय बतलाये हैं। पर वह (ग्रन्थि) छूटती नहीं वरं अधिकाधिक उलझती ही जाती है।
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी॥ अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई॥ ४ ॥
अर्थ:
जीव के हृदय में अज्ञानरूपी अन्धकार विशेषरूप से छा रहा है, इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती, छूटे तो कैसे? जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग (जैसा आगे कहा जाता है) उपस्थित कर देते हैं तब भी कदाचित् ही वह (ग्रन्थि) छूट पाती है।
तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥ नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥ ६ ॥
अर्थ:
उन्हीं [ धर्माचाररूपी] हरे तृणों (घास) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़े को पाकर वह पेन्हावे। निवृत्ति (सांसारिक विषयों से और प्रपंच से हटना) नोई (गौ के दूहते समय पिछले पैर बाँधने की रस्सी) है, विश्वास [दूध दुहने का] बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है (अपने वश में है), दुहनेवाला अहीर है।
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै॥ ७ ॥
अर्थ:
हे भाई! इस प्रकार (धर्माचार में प्रवृत्त सात्त्विकी श्रद्धारूपी गौ से भाव, निवृत्ति और वश में किये हुए निर्मल मन की सहायतासे) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्नि पर भलीभाँति औटावे। फिर क्षमा और संतोषरूपी हवा से उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम (मन का निग्रह)-रूपी जामन देकर उसे जमावे।
मुदिताँ मथै बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥ तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता॥ ८ ॥
अर्थ:
तब मुदिता (प्रसन्नता) रूपी कमोरी में तत्त्वविचाररूपी मथानी से दम (इन्द्रिय-दमन) के आधार पर (दमरूपी खंभे आदि के सहारे) सत्य और सुन्दर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमें से निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकाल ले।
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥ ११७ (क) ॥
अर्थ:
तब योगरूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईंधन लगा दे (सब कर्मों को योगरूपी अग्नि में भस्म कर दे)। जब [वैराग्यरूपी मक्खन का] ममतारूपी मल जल जाय, तब [बचे हुए] ज्ञानरूपी घी को [निश्चयात्मिका] बुद्धि से ठंडा करे।
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥ आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥ १ ॥
अर्थ:
'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखण्ड (तैलधारावत् कभी न टूटनेवाली) वृत्ति है वही [उस ज्ञानदीपक की] परम प्रचण्ड दीपशिखा (लौ) है। [इस प्रकार] जब आत्मानुभव के सुख का सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद-भ्रम का नाश हो जाता है।
प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा॥ तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा॥ २ ॥
अर्थ:
और महान् बलवती अविद्या के परिवार मोह आदि का अपार अन्धकार मिट जाता है। तब वही (विज्ञानरूपिणी) बुद्धि [आत्मानुभवरूप] प्रकाश को पाकर हृदयरूपी घर में बैठकर उस जड़-चेतन की गाँठ को खोलती है।
होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी॥ जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी॥ ५ ॥
अर्थ:
यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई, तो वह उन (ऋद्धि-सिद्धियों) को अहितकर (हानिकर) समझकर उनकी ओर ताकती नहीं। इस प्रकार यदि माया के विघ्नों से बुद्धि बाधित न हुई, तो फिर देवता उपाधि (विघ्न) करते हैं।
इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥ आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥ ६ ॥
अर्थ:
इन्द्रियों के द्वार हृदयरूपी घर के अनेक झरोखे हैं। वहाँ-वहाँ (प्रत्येक झरोखे पर) देवता थाना किए बैठे हैं। ज्यों ही वे विषयरूपी हवा को आते देखते हैं, त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं।
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥ ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥ ७ ॥
अर्थ:
ज्यों ही वह प्रचण्ड हवा हृदयरूपी घर में जाती है, त्यों ही विज्ञानरूपी दीपक बुझ जाता है। गाँठ भी नहीं छूटी और वह (आत्मानुभवरूप) प्रकाश भी मिट गया। विषयरूपी हवा से बुद्धि व्याकुल हो गयी।
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई॥ बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी॥ ८ ॥
अर्थ:
इन्द्रियों और उनके देवताओं को ज्ञान [स्वाभाविक ही] नहीं सुहाता; क्योंकि विषय-भोगों में सदा ही उनकी प्रीति रहती है। और बुद्धि को भी विषयरूपी हवा ने बावली बना दिया। तब फिर (दुबारा) उस ज्ञानदीपक को उसी प्रकार से कौन जलावे?
ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥ जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥ १ ॥
अर्थ:
ज्ञान का मार्ग कृपाण (दुधारी तलवार) की धार के समान है। हे पक्षिराज! इस मार्ग से गिरते देर नहीं लगती। जो इस मार्ग को निर्विघ्न निबाह लेता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परम पद को प्राप्त करता है।
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा॥ ४ ॥
अर्थ:
ऐसा विचार कर हरिभक्त सयाने भक्ति में लुभाए रहते हैं और मुक्ति का निरादर करते हैं। भक्ति करने से संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना यत्न और प्रयास के अपने आप नष्ट हो जाती है।
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥ मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥ २ ॥
अर्थ:
वह दिन-रात अपने-आप ही परम प्रकाशरूप रहता है। उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। [इस प्रकार मणि का एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है] फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती [क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है]; और [तीसरे] लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपक को बुझा नहीं सकती, [क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरे की सहायता से नहीं प्रकाश करती]।
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥ चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥ ५ ॥
अर्थ:
श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत् में वे ही मनुष्य चतुरों के शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणि के लिये भलीभाँति यत्न करते हैं।
पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥ ७ ॥
अर्थ:
वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्रीरामजी की नाना प्रकार की कथाएँ उन पर्वतों में सुन्दर खानें हैं। संत पुरुष [उनकी इन खानों के रहस्य को जानने वाले] मर्मी हैं और सुन्दर बुद्धि [खोदने वाली] कुदाल है। हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य- ये दो उनके नेत्र हैं।