ज्ञान और भक्ति का निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्ति की महान महिमा

यहाँ ज्ञान और भक्ति के स्वरूप का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। ज्ञानदीपक का प्रतीक लेकर बताया गया है कि अंततः भक्ति ही साधक को सहजता से प्रभु तक पहुँचाती है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १८ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा॥ नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर॥ ७ ॥

अर्थ:

भक्ति और ज्ञान में कुछ भी भेद नहीं है। दोनों ही संसार से उत्पन्न क्लेशों को हर लेते हैं। हे नाथ! मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ! उसे सावधान होकर सुनिये।

चौपाई

ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना॥ पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती॥ ८ ॥

अर्थ:

हे हरिजाना! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान-ये सब पुरुष हैं; पुरुष का प्रताप सब प्रकार से प्रबल होता है। अबला (माया) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति (जन्म) से ही जड़ (मूर्ख) होती है।

दोहा

पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर॥ ११५ (क) ॥

अर्थ:

परन्तु जो वैराग्यवान् और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्री को त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयों के वश में हैं (उनके गुलाम हैं) और श्रीरघुवीर के चरणों से विमुख हैं।

सोरठा

सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट॥ ११५ (ख) ॥

अर्थ:

वे ज्ञान के भण्डार मुनि भी मृगनयनी (युवती स्त्री) के चन्द्रमुख को देखकर विवश (उसके अधीन) हो जाते हैं। हे गरुड़जी! साक्षात् भगवान् विष्णु की माया ही स्त्रीरूप से प्रकट है।

दोहा 116 के अंतर्गत
चौपाई

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ॥ मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥ १ ॥

अर्थ:

यहाँ मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता। वेद, पुराण और संतों का मत (सिद्धान्त) ही कहता हूँ। हे गरुड़जी ! यह अनुपम (विलक्षण) रीति है कि एक स्त्री के रूप पर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती।

चौपाई

माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥ पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥ २ ॥

अर्थ:

आप सुनिये, माया और भक्ति-ये दोनों ही स्त्रीवर्ग की हैं, यह सब कोई जानते हैं। फिर श्रीरघुवीर को भक्ति प्यारी है। माया बेचारी तो निश्चय ही नाचनेवाली (नटिनीमात्र) है।

चौपाई

भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥ राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी भक्ति के विशेष अनुकूल रहते हैं। इसीसे माया उससे अत्यन्त डरती रहती है। जिसके हृदय में उपमारहित और उपाधिरहित (विशुद्ध) रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा (रोक-टोक) के बसती है।

चौपाई

तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई॥ अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहिं भगति सकल सुख खानी॥ ४ ॥

अर्थ:

उसे देखकर माया सकुचा जाती है। उस पर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर (चला) सकती। ऐसा विचारकर ही जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखों की खानि भक्ति की ही याचना करते हैं।

दोहा

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ॥ ११६ (क) ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी का यह रहस्य (गुप्त मर्म) जल्दी कोई भी नहीं जान पाता। श्रीरघुनाथजी की कृपा से जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्न में भी मोह नहीं होता।

दोहा

औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन॥ ११६ (ख) ॥

अर्थ:

हे सुचतुर गरुड़जी! ज्ञान और भक्ति का और भी भेद सुनिये, जिसके सुनने से श्रीरामजी के चरणों में सदा अविच्छिन्न (एकतार) प्रेम हो जाता है।

दोहा 117 के अंतर्गत
चौपाई

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी॥ ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी॥ १ ॥

अर्थ:

है तात! यह अकथनीय कहानी (वार्ता) सुनिये। यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती। जीव ईश्वर का अंश है। [अतएव] वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है।

चौपाई

सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥ जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥ २ ॥

अर्थ:

हे गोसाईं! वह मायाके वशीभूत होकर तोते और वानरकी भाँति अपने-आप ही बाँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतन में ग्रन्थि (गाँठ) पड़ गयी। यद्यपि वह ग्रन्थि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटने में कठिनता है।

चौपाई

तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥ ३ ॥

अर्थ:

तभीसे जीव संसारी (जन्मने-मरनेवाला) हो गया। अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणों ने बहुत-से उपाय बतलाये हैं। पर वह (ग्रन्थि) छूटती नहीं वरं अधिकाधिक उलझती ही जाती है।

चौपाई

जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी॥ अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई॥ ४ ॥

अर्थ:

जीव के हृदय में अज्ञानरूपी अन्धकार विशेषरूप से छा रहा है, इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती, छूटे तो कैसे? जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग (जैसा आगे कहा जाता है) उपस्थित कर देते हैं तब भी कदाचित् ही वह (ग्रन्थि) छूट पाती है।

चौपाई

सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई॥ जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा॥ ५ ॥

अर्थ:

श्रीहरि की कृपा से यदि सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयरूपी घर में आकर बस जाय; असंख्यों जप, तप, ब्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार (आचरण), जो श्रुतियों ने कहे हैं,।

चौपाई

तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥ नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥ ६ ॥

अर्थ:

उन्हीं [ धर्माचाररूपी] हरे तृणों (घास) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़े को पाकर वह पेन्हावे। निवृत्ति (सांसारिक विषयों से और प्रपंच से हटना) नोई (गौ के दूहते समय पिछले पैर बाँधने की रस्सी) है, विश्वास [दूध दुहने का] बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है (अपने वश में है), दुहनेवाला अहीर है।

चौपाई

परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै॥ ७ ॥

अर्थ:

हे भाई! इस प्रकार (धर्माचार में प्रवृत्त सात्त्विकी श्रद्धारूपी गौ से भाव, निवृत्ति और वश में किये हुए निर्मल मन की सहायतासे) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्नि पर भलीभाँति औटावे। फिर क्षमा और संतोषरूपी हवा से उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम (मन का निग्रह)-रूपी जामन देकर उसे जमावे।

चौपाई

मुदिताँ मथै बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥ तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता॥ ८ ॥

अर्थ:

तब मुदिता (प्रसन्नता) रूपी कमोरी में तत्त्वविचाररूपी मथानी से दम (इन्द्रिय-दमन) के आधार पर (दमरूपी खंभे आदि के सहारे) सत्य और सुन्दर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमें से निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकाल ले।

दोहा

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥ ११७ (क) ॥

अर्थ:

तब योगरूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईंधन लगा दे (सब कर्मों को योगरूपी अग्नि में भस्म कर दे)। जब [वैराग्यरूपी मक्खन का] ममतारूपी मल जल जाय, तब [बचे हुए] ज्ञानरूपी घी को [निश्चयात्मिका] बुद्धि से ठंडा करे।

दोहा

तब बिग्यानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ। चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ॥ ११७ (ख) ॥

अर्थ:

तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस [ज्ञानरूपी] निर्मल घी को पाकर उससे चित्तरूपी दीये को भरकर, समता की दीवट बनाकर, उस पर उसे दृढ़तापूर्वक (जमाकर) रखे।

दोहा

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि। तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि॥ ११७ (ग) ॥

अर्थ:

[जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति] तीनों अवस्थाएँ और [सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणरूपी कपास से तुरीयावस्थारूपी रूई को निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावे।

सोरठा

एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय। जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब॥ ११७ (घ) ॥

अर्थ:

इस प्रकार तेज की राशि विज्ञानमय दीपक को जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जायँ।

दोहा 118 के अंतर्गत
चौपाई

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥ आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥ १ ॥

अर्थ:

'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखण्ड (तैलधारावत्‌ कभी न टूटनेवाली) वृत्ति है वही [उस ज्ञानदीपक की] परम प्रचण्ड दीपशिखा (लौ) है। [इस प्रकार] जब आत्मानुभव के सुख का सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद-भ्रम का नाश हो जाता है।

चौपाई

प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा॥ तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा॥ २ ॥

अर्थ:

और महान्‌ बलवती अविद्या के परिवार मोह आदि का अपार अन्धकार मिट जाता है। तब वही (विज्ञानरूपिणी) बुद्धि [आत्मानुभवरूप] प्रकाश को पाकर हृदयरूपी घर में बैठकर उस जड़-चेतन की गाँठ को खोलती है।

चौपाई

छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥ छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि वह (विज्ञानरूपिणी बुद्धि) उस गाँठ को खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो। परन्तु हे पक्षिराज गरुड़जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेक विघ्न करती है।

चौपाई

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई॥ कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे भाई! वह बहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियों को भेजती है, जो आकर बुद्धि को लोभ दिखाती हैं। और वे कल, बल और छल करके समीप जाती हैं और आँचल की वायु से उस दीपक को बुझा देती हैं।

चौपाई

होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी॥ जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी॥ ५ ॥

अर्थ:

यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई, तो वह उन (ऋद्धि-सिद्धियों) को अहितकर (हानिकर) समझकर उनकी ओर ताकती नहीं। इस प्रकार यदि माया के विघ्नों से बुद्धि बाधित न हुई, तो फिर देवता उपाधि (विघ्न) करते हैं।

चौपाई

इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥ आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥ ६ ॥

अर्थ:

इन्द्रियों के द्वार हृदयरूपी घर के अनेक झरोखे हैं। वहाँ-वहाँ (प्रत्येक झरोखे पर) देवता थाना किए बैठे हैं। ज्यों ही वे विषयरूपी हवा को आते देखते हैं, त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं।

चौपाई

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥ ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥ ७ ॥

अर्थ:

ज्यों ही वह प्रचण्ड हवा हृदयरूपी घर में जाती है, त्यों ही विज्ञानरूपी दीपक बुझ जाता है। गाँठ भी नहीं छूटी और वह (आत्मानुभवरूप) प्रकाश भी मिट गया। विषयरूपी हवा से बुद्धि व्याकुल हो गयी।

चौपाई

इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई॥ बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी॥ ८ ॥

अर्थ:

इन्द्रियों और उनके देवताओं को ज्ञान [स्वाभाविक ही] नहीं सुहाता; क्योंकि विषय-भोगों में सदा ही उनकी प्रीति रहती है। और बुद्धि को भी विषयरूपी हवा ने बावली बना दिया। तब फिर (दुबारा) उस ज्ञानदीपक को उसी प्रकार से कौन जलावे?

दोहा

तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥ ११८ (क) ॥

अर्थ:

[इस प्रकार ज्ञानदीपक के बुझ जाने पर] तब फिर जीव अनेक प्रकार से संसृति के क्लेश पाता है। हे पक्षिराज! हरि की माया अत्यन्त दुस्तर है, वह सहज ही में तरी नहीं जा सकती।

दोहा

कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक॥ ११८ (ख) ॥

अर्थ:

ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन, समझने में कठिन और साधने में भी कठिन है। यदि घुणाक्षर न्याय से (संयोगवश) कदाचित् यह ज्ञान हो भी जाय, तो फिर [उसे बचाये रखने में] अनेक विघ्न हैं।

दोहा 119 के अंतर्गत
चौपाई

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा॥ जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥ १ ॥

अर्थ:

ज्ञान का मार्ग कृपाण (दुधारी तलवार) की धार के समान है। हे पक्षिराज! इस मार्ग से गिरते देर नहीं लगती। जो इस मार्ग को निर्विघ्न निबाह लेता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परम पद को प्राप्त करता है।

चौपाई

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥ राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआईं॥ २ ॥

अर्थ:

संत, पुराण, निगम और आगम सब यह कहते हैं कि कैवल्य रूप परम पद अत्यन्त दुर्लभ है; किन्तु हे गोसाईं! वही [अत्यन्त दुर्लभ] मुक्ति श्रीरामजी को भजने से बिना इच्छा किए भी जबरदस्ती आ जाती है।

चौपाई

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥ तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥ ३ ॥

अर्थ:

जैसे स्थल के बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकार के उपाय क्यों न करे। वैसे ही, हे पक्षिराज! सुनिए, मोक्षसुख भी श्रीहरि की भक्ति को छोड़कर नहीं रह सकता।

चौपाई

अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा विचार कर हरिभक्त सयाने भक्ति में लुभाए रहते हैं और मुक्ति का निरादर करते हैं। भक्ति करने से संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना यत्न और प्रयास के अपने आप नष्ट हो जाती है।

चौपाई

भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥ असि हरि भगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई॥ ५ ॥

अर्थ:

जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्ति के लिये और उस भोजन को जठराग्नि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टा के) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा?

दोहा

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि। भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥ ११९ (क) ॥

अर्थ:

हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सेवक और सेव्य के भाव के बिना भव-सागर से तरना नहीं हो सकता। ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों का भजन कीजिये।

दोहा

जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य॥ ११९ (ख) ॥

अर्थ:

जो चेतन को जड़ कर देता है और जड़ को चेतन कर देता है, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजी को जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं।

दोहा 120 के अंतर्गत
चौपाई

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई॥ राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥ १ ॥

अर्थ:

मैंने ज्ञान का सिद्धान्त समझाकर कहा। अब भक्तिरूपी मणि की प्रभुता (महिमा) सुनिये। श्रीरामजी की भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है। हे गरुड़जी! यह जिसके हृदय के अंदर बसती है।

चौपाई

परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥ मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥ २ ॥

अर्थ:

वह दिन-रात अपने-आप ही परम प्रकाशरूप रहता है। उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। [इस प्रकार मणि का एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है] फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती [क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है]; और [तीसरे] लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपक को बुझा नहीं सकती, [क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरे की सहायता से नहीं प्रकाश करती]।

चौपाई

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई॥ खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

[उसके प्रकाश से] अविद्या का प्रबल अन्धकार मिट जाता है। पतंगों का सारा समूह हार जाता है। जिसके हृदय में भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते।

चौपाई

गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥ ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥ ४ ॥

अर्थ:

उसके लिये विष अमृत के समान और शत्रु मित्र हो जाता है। उस मणि के बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश होकर सब जीव दुखी हो रहे हैं, उसे नहीं व्यापते।

चौपाई

राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥ चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत् में वे ही मनुष्य चतुरों के शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणि के लिये भलीभाँति यत्न करते हैं।

चौपाई

सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई॥ सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटभेरे॥ ६ ॥

अर्थ:

यद्यपि वह मणि जगत् में प्रकट (प्रत्यक्ष) है, पर बिना श्रीरामजी की कृपा के उसे कोई पा नहीं सकता। उसके पाने के उपाय भी सुगम ही हैं पर अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं।

चौपाई

पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना॥ मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी॥ ७ ॥

अर्थ:

वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्रीरामजी की नाना प्रकार की कथाएँ उन पर्वतों में सुन्दर खानें हैं। संत पुरुष [उनकी इन खानों के रहस्य को जानने वाले] मर्मी हैं और सुन्दर बुद्धि [खोदने वाली] कुदाल है। हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य- ये दो उनके नेत्र हैं।

चौपाई

भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥ मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥ ८ ॥

अर्थ:

जो प्राणी उसे प्रेम के साथ खोजता है, वह सब सुखों की खान इस भक्तिरूपी मणि को पा जाता है। हे प्रभो! मेरे मन में तो ऐसा विश्वास है कि श्रीरामजी के दास श्रीरामजी से भी बढ़कर हैं।

चौपाई

राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥ सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥ ९ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्रीहरि चन्दन के वृक्ष हैं तो संत पवन हैं। सब साधनों का फल सुन्दर हरिभक्ति ही है। उसे संत के बिना किसी ने नहीं पाया।

चौपाई

अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा॥ १० ॥

अर्थ:

ऐसा विचारकर जो भी संतों का संग करता है, हे गरुड़जी! उसके लिये श्रीरामजी की भक्ति सुलभ हो जाती है।

दोहा

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं॥ १२० (क) ॥

अर्थ:

ब्रह्म (वेद) समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्र को मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिरूपी मधुरता बसी रहती है।

दोहा

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि॥ १२० (ख) ॥

अर्थ:

वैराग्यरूपी ढाल से अपने को बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवार से मद, लोभ और मोहरूपी वैरियों को मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज! इसे विचारकर देखिये।