सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख
सोरठा ११५ (ख) · उत्तरकाण्ड
सोरठा पाठ
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट॥ ११५ (ख) ॥
अर्थ
वे ज्ञान के भण्डार मुनि भी मृगनयनी (युवती स्त्री) के चन्द्रमुख को देखकर विवश (उसके अधीन) हो जाते हैं। हे गरुड़जी! साक्षात् भगवान् विष्णु की माया ही स्त्रीरूप से प्रकट है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का सोरठा ११५ (ख) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा