अस बिचारि हरि भगत सयाने
अस बिचारि हरि भगत सयाने
चौपाई ४, दोहा ११९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा॥ ४ ॥
अर्थ
ऐसा विचार कर हरिभक्त सयाने भक्ति में लुभाए रहते हैं और मुक्ति का निरादर करते हैं। भक्ति करने से संसृति (जन्म-मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना यत्न और प्रयास के अपने आप नष्ट हो जाती है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा