सेवक सेब्य भाव बिनु भव न
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न
दोहा ११९ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि। भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥ ११९ (क) ॥
अर्थ
हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सेवक और सेव्य के भाव के बिना भव-सागर से तरना नहीं हो सकता। ऐसा सिद्धान्त विचारकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों का भजन कीजिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का दोहा ११९ (क) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा