इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ

चौपाई १, दोहा ११६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ॥ मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा॥ १ ॥

अर्थ

यहाँ मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता। वेद, पुराण और संतों का मत (सिद्धान्त) ही कहता हूँ। हे गरुड़जी ! यह अनुपम (विलक्षण) रीति है कि एक स्त्री के रूप पर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

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ज्ञान और भक्ति की महिमा