जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी
चौपाई ४, दोहा ११७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी॥ अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई॥ ४ ॥
अर्थ
जीव के हृदय में अज्ञानरूपी अन्धकार विशेषरूप से छा रहा है, इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती, छूटे तो कैसे? जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग (जैसा आगे कहा जाता है) उपस्थित कर देते हैं तब भी कदाचित् ही वह (ग्रन्थि) छूट पाती है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा