जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई
चौपाई ७, दोहा ११८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई॥ ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा॥ ७ ॥
अर्थ
ज्यों ही वह प्रचण्ड हवा हृदयरूपी घर में जाती है, त्यों ही विज्ञानरूपी दीपक बुझ जाता है। गाँठ भी नहीं छूटी और वह (आत्मानुभवरूप) प्रकाश भी मिट गया। विषयरूपी हवा से बुद्धि व्याकुल हो गयी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ११८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा