गरल सुधासम अरि हित होई
गरल सुधासम अरि हित होई
चौपाई ४, दोहा १२० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥ ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥ ४ ॥
अर्थ
उसके लिये विष अमृत के समान और शत्रु मित्र हो जाता है। उस मणि के बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिनके वश होकर सब जीव दुखी हो रहे हैं, उसे नहीं व्यापते।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा