जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म
दोहा ११७ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ॥ ११७ (क) ॥
अर्थ
तब योगरूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईंधन लगा दे (सब कर्मों को योगरूपी अग्नि में भस्म कर दे)। जब [वैराग्यरूपी मक्खन का] ममतारूपी मल जल जाय, तब [बचे हुए] ज्ञानरूपी घी को [निश्चयात्मिका] बुद्धि से ठंडा करे।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का दोहा ११७ (क) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा