तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ

दोहा ११८ (क) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥ ११८ (क) ॥

अर्थ

[इस प्रकार ज्ञानदीपक के बुझ जाने पर] तब फिर जीव अनेक प्रकार से संसृति के क्लेश पाता है। हे पक्षिराज! हरि की माया अत्यन्त दुस्तर है, वह सहज ही में तरी नहीं जा सकती।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का दोहा ११८ (क) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

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ज्ञान और भक्ति की महिमा