राम सिंधु घन सज्जन धीरा

चौपाई ९, दोहा १२० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥ सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥ ९ ॥

अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्रीहरि चन्दन के वृक्ष हैं तो संत पवन हैं। सब साधनों का फल सुन्दर हरिभक्ति ही है। उसे संत के बिना किसी ने नहीं पाया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ९, दोहा १२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

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ज्ञान और भक्ति की महिमा