तब ते जीव भयउ संसारी
तब ते जीव भयउ संसारी
चौपाई ३, दोहा ११७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी॥ श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई॥ ३ ॥
अर्थ
तभीसे जीव संसारी (जन्मने-मरनेवाला) हो गया। अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणों ने बहुत-से उपाय बतलाये हैं। पर वह (ग्रन्थि) छूटती नहीं वरं अधिकाधिक उलझती ही जाती है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा