काकभुशुण्डिजी का लोमशजी के पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना

काकभुशुण्डिजी लोमशजी के पास जाते हैं, जहाँ उन्हें शाप भी मिलता है और अनुग्रह भी। यही अनुभव उनकी भक्ति को और अधिक दृढ़ और अखंड बनाता है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १७ / २१

प्रकरण पाठ

दोहा

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥ ११० (क) ॥

अर्थ:

गुरुजी के वचनों का स्मरण करके मेरा मन श्रीरामजी के चरणों में लग गया। मैं क्षण-क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त करता हुआ श्रीरघुनाथजी का यश गाता फिरता था।

दोहा

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन॥ ११० (ख) ॥

अर्थ:

सुमेरु पर्वत के शिखर पर बड़ की छाया में लोमश मुनि बैठे थे। उन्हें देखकर मैंने उनके चरणों में सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे।

दोहा

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज॥ ११० (ग) ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज! मेरे अत्यन्त विनीत और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि मुझसे आदर के साथ पूछने लगे—हे ब्राह्मण! आप किस कार्य से यहाँ आये हैं।

दोहा

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान॥ ११० (घ) ॥

अर्थ:

तब मैंने कहा—हे कृपानिधि! आप सर्वज्ञ हैं और सुजान हैं। हे भगवन्‌! मुझे सगुण ब्रह्म की आराधना [की प्रक्रिया] कहिये।

दोहा 111 के अंतर्गत
चौपाई

तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा॥ ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी। मोहि परम अधिकारी जानी॥ १ ॥

अर्थ:

तब हे पक्षिराज! मुनीश्वर ने श्रीरघुनाथजी के गुणों की कुछ कथाएँ आदर सहित कहीं। फिर वे ब्रह्मज्ञान-रत विज्ञानवान्‌ मुनि मुझे परम अधिकारी जानकर—

चौपाई

लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वैत अगुन हृदयेसा॥ अकल अनीह अनाम अरूपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥ २ ॥

अर्थ:

ब्रह्म का उपदेश करने लगे कि वह अजन्मा है, अद्वैत है, निर्गुण है और हृदय का स्वामी (अन्तर्यामी) है। उसे कोई बुद्धि के द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, अनुभव से जाननेयोग्य, अखण्ड और उपमारहित है।

चौपाई

मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ ३ ॥

अर्थ:

वह मन और इन्द्रियों से परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्विकार, सीमा रहित और सुख की राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है (तत्त्वमसि), जल और जल की लहर की भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है।

चौपाई

बिबिधि भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा॥ पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनि ने मुझे अनेकों प्रकार से समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदय में नहीं बैठा। मैंने फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर कहा—हे मुनीश्वर! मुझे सगुण ब्रह्म की उपासना कहिये।

चौपाई

राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥ सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥ ५ ॥

अर्थ:

मेरा मन रामभक्ति रूपी जल में मछली हो रहा है (उसी में रम रहा है)। हे चतुर मुनीश्वर! ऐसी दशा में वह उससे अलग कैसे हो सकता है ? आप दया करके मुझे वही उपदेश (उपाय) कहिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजी को अपनी आँखों से देख सकूँ।

चौपाई

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा॥ मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा॥ ६ ॥

अर्थ:

[पहले] नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथ को देखकर, तब निर्गुण का उपदेश सुनूँगा। मुनि ने फिर अनुपम हरिकथा कहकर, सगुण मत का खण्डन करके निर्गुण का निरूपण किया।

चौपाई

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी॥ उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा॥ ७ ॥

अर्थ:

तब मैं निर्गुण मत को हटाकर बहुत हठ करके सगुण का निरूपण करने लगा। मैंने उत्तर-प्रत्युत्तर किया, इससे मुनि के शरीर में क्रोध के चिह्न उत्पन्न हो गये।

चौपाई

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥ अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥ ८ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! सुनिये, बहुत अपमान करने पर ज्ञानी के भी हृदय में क्रोध उत्पन्न हो जाता है। यदि कोई चन्दन की लकड़ी को बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी अग्नि प्रकट हो जायगी।

दोहा

बारंबार सकोप मुनि करइ निरूपन ग्यान। मैं अपने मन बैठ तब करउँ बिबिधि अनुमान॥ १११ (क) ॥

अर्थ:

मुनि बार-बार क्रोधसहित ज्ञान का निरूपण करने लगे। तब मैं बैठा-बैठा अपने मन में अनेकों प्रकार के अनुमान करने लगा।

दोहा

क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान॥ १११ (ख) ॥

अर्थ:

बिना द्वैतबुद्धि के क्रोध कैसा और बिना अज्ञान के क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वर के समान हो सकता है ?

दोहा 112 के अंतर्गत
चौपाई

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें॥ परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका॥ १ ॥

अर्थ:

सबका हित चाहने से क्या कभी दुःख हो सकता है? जिसके पास पारसमणि है, उसके पास क्या दरिद्रता रह सकती है? दूसरे से द्रोह करनेवाले क्या निर्भय हो सकते हैं और कामी क्या कलंक-रहित रह सकते हैं?

चौपाई

बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥ काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥ २ ॥

अर्थ:

ब्राह्मण का बुरा करने से क्या वंश रह सकता है? स्वरूप की पहचान होने पर क्या [आसक्तिपूर्वक] कर्म हो सकते हैं? दुष्टों के संग से क्या किसी की सुमति उत्पन्न हुई है? परस्त्रीगामी क्या उत्तम गति पा सकता है?

चौपाई

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक॥ राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें॥ ३ ॥

अर्थ:

परमात्मा को जाननेवाले क्या भव में पड़ सकते हैं? भगवान् की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है? श्रीहरि के चरित्र का बखान करने पर क्या पाप रह सकते हैं?

चौपाई

पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई॥ लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना॥ ४ ॥

अर्थ:

बिना पुण्य के क्या पवित्र यश प्राप्त हो सकता है? बिना पाप के भी क्या कोई अपयश पा सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं, उस हरि-भक्ति के समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है?

चौपाई

हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई॥ अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना॥ ५ ॥

अर्थ:

हे भाई। जगत् में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्य का शरीर पाकर भी श्रीरामजी का भजन न किया जाय? चुगलखोरी के समान क्या कोई दूसरा पाप है? और हे गरुड़जी! दया के समान क्या कोई दूसरा धर्म है?

चौपाई

एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ॥ पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा॥ ६ ॥

अर्थ:

इस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मन में विचारता था और आदर के साथ मुनि का उपदेश नहीं सुनता था। जब मैंने बार-बार सगुण का पक्ष स्थापित किया, तब मुनि क्रोधयुक्त वचन बोले--

चौपाई

मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि॥ सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही॥ ७ ॥

अर्थ:

ओरे मूढ़! मैं तुझे सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ, तो भी तू उसे नहीं मानता और बहुत-से उत्तर-प्रत्युत्तर लाकर रखता है। मेरे सत्य वचन पर विश्वास नहीं करता! कौए की भाँति सभी से डरता है।

चौपाई

सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥ लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई॥ ८ ॥

अर्थ:

ओरे मूढ़! तेरे हृदय में अपने पक्ष का बड़ा भारी हठ है, अतः तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनंद के साथ मुनि के शाप को सिर पर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आई।

दोहा

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ। सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ॥ ११२ (क) ॥

अर्थ:

तब मैं तुरंत ही कौआ हो गया। फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर और रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजी का स्मरण करके मैं हर्षित होकर उड़ चला।

दोहा

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥ ११२ (ख) ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जो श्रीरामजी के चरणों के प्रेमी हैं और काम, मद तथा क्रोध से रहित हैं, वे जगत् को अपने प्रभुमय देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें?

दोहा 113 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥ कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी॥ १ ॥

अर्थ:

[काकभुशुण्डिजी ने कहा--] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, इसमें ऋषि का कुछ भी दोष नहीं था। रघुवंश के विभूषण श्रीरामजी ही सबके हृदय में प्रेरणा करनेवाले हैं। कृपासागर प्रभु ने मुनि की बुद्धि को भोली करके मेरे प्रेम की परीक्षा ली।

चौपाई

मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना॥ रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी॥ २ ॥

अर्थ:

मन, वचन और कर्म से जब प्रभु ने मुझे अपना जन जान लिया, तब भगवान् ने मुनि की बुद्धि फिर पलट दी। ऋषि ने मेरी महत् शीलता देखी, राम चरणों में विशेष विश्वास देखा।

चौपाई

अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई॥ मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा॥ ३ ॥

अर्थ:

तब मुनि ने बहुत दुःख के साथ बार-बार पछताकर मुझे आदरपूर्वक बुला लिया। उन्होंने अनेकों प्रकार से मेरा सन्तोष किया और तब हर्षित होकर मुझे राममंत्र दिया।

चौपाई

बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना॥ सुंदर सुखद मोहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा॥ ४ ॥

अर्थ:

कृपानिधान मुनि ने मुझे बालरूप श्रीरामजी का ध्यान (ध्यान की विधि) बतलाया। सुन्दर और सुख देनेवाला यह ध्यान मुझे बहुत ही अच्छा लगा। वह ध्यान मैं आपको पहले ही सुना चुका हूँ।

चौपाई

मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा॥ सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई॥ ५ ॥

अर्थ:

मुनि ने कुछ समय तक मुझको वहाँ (अपने पास) रखा। तब उन्होंने रामचरितमानस वर्णन किया। आदरपूर्वक मुझे यह कथा सुनाकर फिर मुनि मुझसे सुन्दर वाणी बोले--

चौपाई

रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा॥ तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी॥ ६ ॥

अर्थ:

हे तात! यह सुन्दर और गुप्त रामचरित सर मैंने शंभु की कृपा से पाया था। तुम्हें श्रीरामजी का निज भक्त जानकर ही मैंने तुमसे सब चरित्र विस्तार के साथ कहा।

चौपाई

राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥ मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥ ७ ॥

अर्थ:

हे तात! जिनके हृदय में श्रीरामजी की भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिये। मुनि ने मुझे बहुत प्रकार से समझाया। तब मैंने प्रेम के साथ मुनि के चरणों में सिर नवाया।

चौपाई

निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा॥ राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें॥ ८ ॥

अर्थ:

मुनीश ने अपने कर-कमलों से मेरा सिर स्पर्श करके हर्षित होकर आशीर्वाद दिया कि अब मेरी कृपा से तेरे हृदय में सदा प्रगाढ़ रामभक्ति बसेगी।

दोहा

सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान। कामरूप इच्छामरन ग्यान बिराग निधान॥ ११३ (क) ॥

अर्थ:

तुम सदा श्रीरामजी को प्रिय होओ और कल्याणरूप गुणों के धाम, मानरहित, इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ, इच्छामरण, ज्ञान और वैराग्य के भण्डार होओ।

दोहा

जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत। ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत॥ ११३ (ख) ॥

अर्थ:

इतना ही नहीं, श्रीभगवान् को स्मरण करते हुए तुम जिस आश्रम में निवास करोगे वहाँ एक योजन (चार कोस) तक अविद्या (माया-मोह) नहीं व्यापेगी।

दोहा 114 के अंतर्गत
चौपाई

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ॥ राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥ १ ॥

अर्थ:

काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभाव से उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा। अनेकों प्रकार के सुन्दर श्रीरामजी के रहस्य (गुप्त मर्म के चरित्र और गुण), जो इतिहास और पुराणों में गुप्त और प्रकट हैं (वर्णित और लक्षित हैं)।

चौपाई

बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥ जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

तुम उन सबको भी बिना ही परिश्रम जान जाओगे। श्रीरामजी के चरणों में तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो। अपने मन में तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरि की कृपा से उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी।

चौपाई

सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा॥ एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, मुनि का आशीर्वाद सुनकर आकाश में गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन ऐसा ही (सत्य) हो। यह कर्म, मन और वचन से मेरा भक्त है।

चौपाई

सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ॥ करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई॥ ४ ॥

अर्थ:

आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ। मैं प्रेम में मग्र हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा। तदनन्तर मुनि की विनती करके, आज्ञा पाकर और उनके चरणकमलों में बार-बार सिर नवाकर—

चौपाई

हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ॥ इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा॥ ५ ॥

अर्थ:

मैं हर्ष सहित इस आश्रम में आया। प्रभु श्रीरामजी की कृपा से मैंने दुर्लभ वर पा लिया। हे पक्षिराज! मुझे यहाँ निवास करते सत्ताईस कल्प बीत गये।

चौपाई

करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना॥ जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा॥ ६ ॥

अर्थ:

मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजी के गुणों का गान किया करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। अयोध्यापुरी में जब-जब श्रीरघुवीर भक्तों के हित के लिये मनुष्य शरीर धारण करते हैं,

चौपाई

तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥ पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥ ७ ॥

अर्थ:

तब-तब मैं जाकर श्रीरामजी की नगरी में रहता हूँ और प्रभु की शिशुलीला देखकर सुख प्राप्त करता हूँ। फिर हे पक्षिराज! श्रीरामजी के शिशुरूप को हृदय में रखकर मैं अपने आश्रम में आ जाता हूँ।

चौपाई

कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई॥ कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी॥ ८ ॥

अर्थ:

जिस कारण से मैंने कौए की देह पायी, वह सारी कथा आपको सुना दी। हे तात! मैंने आपके सब प्रश्नों के उत्तर कहे। अहा! रामभक्ति की बड़ी भारी महिमा है।

दोहा

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह। निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह॥ ११४ (क) ॥

अर्थ:

मुझे अपना यह काक शरीर इसीलिये प्रिय है कि इसमें मुझे श्रीरामजी के चरणों का प्रेम प्राप्त हुआ। इसी शरीर से मैंने अपने प्रभु के दर्शन पाये और मेरे सब सन्देह जाते रहे (दूर हुए)।

दोहा

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥ ११४ (ख) ॥

अर्थ:

मैं हठ करके भक्तिपक्ष पर अड़ा रहा, जिससे महर्षि ने मुझे शाप दिया; परन्तु उसका फल यह हुआ कि जो मुनियों को भी दुर्लभ है, वह वरदान मैंने पाया। भजन का प्रताप तो देखिये!

दोहा 115 के अंतर्गत
चौपाई

जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥ १ ॥

अर्थ:

जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञान के लिये श्रम (साधन) करते हैं, वे मूर्ख घर में खड़ी हुई कामधेनु को छोड़कर दूध के लिये मदार के पेड़ को खोजते फिरते हैं।

चौपाई

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥ ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥ २ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग श्रीहरि की भक्ति को छोड़कर दूसरे उपायों से सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले (अभागे) बिना ही जहाज के तैरकर महासमुद्र के पार जाना चाहते हैं।

चौपाई

सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥ तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! भुशुण्डि के वचन सुनकर गरुड़जी हर्षित होकर कोमल वाणी से बोले-हे प्रभो! आपके प्रसाद से मेरे हृदय में अब सन्देह, शोक, मोह और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया।

चौपाई

सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा॥ एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही॥ ४ ॥

अर्थ:

मैंने आपकी कृपा से श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र गुणसमूहों को सुना और शान्ति प्राप्त की। हे प्रभो! अब मैं आपसे एक बात और पूछता हूँ। हे कृपासागर! मुझे समझाकर कहिये।

चौपाई

कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना॥ सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं॥ ५ ॥

अर्थ:

संत, मुनि, वेद और पुराण यह कहते हैं कि ज्ञान के समान दुर्लभ कुछ भी नहीं है। हे गोसाईं! वही ज्ञान मुनि ने आपसे कहा, परन्तु आपने भक्ति के समान उसका आदर नहीं किया।

चौपाई

ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥ सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना॥ ६ ॥

अर्थ:

हे कृपा के धाम! हे प्रभो! ज्ञान और भक्ति में कितना अन्तर है? यह सब मुझसे कहिये। गरुड़जी के वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डि जी ने सुख माना और आदर के साथ कहा--।