काकभुशुण्डिजी का लोमशजी के पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
काकभुशुण्डिजी लोमशजी के पास जाते हैं, जहाँ उन्हें शाप भी मिलता है और अनुग्रह भी। यही अनुभव उनकी भक्ति को और अधिक दृढ़ और अखंड बनाता है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण १७ / २१
प्रकरण पाठ
लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वैत अगुन हृदयेसा॥ अकल अनीह अनाम अरूपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥ २ ॥
अर्थ:
ब्रह्म का उपदेश करने लगे कि वह अजन्मा है, अद्वैत है, निर्गुण है और हृदय का स्वामी (अन्तर्यामी) है। उसे कोई बुद्धि के द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, अनुभव से जाननेयोग्य, अखण्ड और उपमारहित है।
मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ ३ ॥
अर्थ:
वह मन और इन्द्रियों से परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्विकार, सीमा रहित और सुख की राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है (तत्त्वमसि), जल और जल की लहर की भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है।
राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥ सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥ ५ ॥
अर्थ:
मेरा मन रामभक्ति रूपी जल में मछली हो रहा है (उसी में रम रहा है)। हे चतुर मुनीश्वर! ऐसी दशा में वह उससे अलग कैसे हो सकता है ? आप दया करके मुझे वही उपदेश (उपाय) कहिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजी को अपनी आँखों से देख सकूँ।
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें॥ परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका॥ १ ॥
अर्थ:
सबका हित चाहने से क्या कभी दुःख हो सकता है? जिसके पास पारसमणि है, उसके पास क्या दरिद्रता रह सकती है? दूसरे से द्रोह करनेवाले क्या निर्भय हो सकते हैं और कामी क्या कलंक-रहित रह सकते हैं?
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥ काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥ २ ॥
अर्थ:
ब्राह्मण का बुरा करने से क्या वंश रह सकता है? स्वरूप की पहचान होने पर क्या [आसक्तिपूर्वक] कर्म हो सकते हैं? दुष्टों के संग से क्या किसी की सुमति उत्पन्न हुई है? परस्त्रीगामी क्या उत्तम गति पा सकता है?
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक॥ राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें॥ ३ ॥
अर्थ:
परमात्मा को जाननेवाले क्या भव में पड़ सकते हैं? भगवान् की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है? श्रीहरि के चरित्र का बखान करने पर क्या पाप रह सकते हैं?
पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई॥ लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना॥ ४ ॥
अर्थ:
बिना पुण्य के क्या पवित्र यश प्राप्त हो सकता है? बिना पाप के भी क्या कोई अपयश पा सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं, उस हरि-भक्ति के समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है?
हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई॥ अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना॥ ५ ॥
अर्थ:
हे भाई। जगत् में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्य का शरीर पाकर भी श्रीरामजी का भजन न किया जाय? चुगलखोरी के समान क्या कोई दूसरा पाप है? और हे गरुड़जी! दया के समान क्या कोई दूसरा धर्म है?
सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥ लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई॥ ८ ॥
अर्थ:
ओरे मूढ़! तेरे हृदय में अपने पक्ष का बड़ा भारी हठ है, अतः तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनंद के साथ मुनि के शाप को सिर पर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आई।
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥ कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी॥ १ ॥
अर्थ:
[काकभुशुण्डिजी ने कहा--] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, इसमें ऋषि का कुछ भी दोष नहीं था। रघुवंश के विभूषण श्रीरामजी ही सबके हृदय में प्रेरणा करनेवाले हैं। कृपासागर प्रभु ने मुनि की बुद्धि को भोली करके मेरे प्रेम की परीक्षा ली।
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥ मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥ ७ ॥
अर्थ:
हे तात! जिनके हृदय में श्रीरामजी की भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिये। मुनि ने मुझे बहुत प्रकार से समझाया। तब मैंने प्रेम के साथ मुनि के चरणों में सिर नवाया।
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ॥ राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना॥ १ ॥
अर्थ:
काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभाव से उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा। अनेकों प्रकार के सुन्दर श्रीरामजी के रहस्य (गुप्त मर्म के चरित्र और गुण), जो इतिहास और पुराणों में गुप्त और प्रकट हैं (वर्णित और लक्षित हैं)।
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥ जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
तुम उन सबको भी बिना ही परिश्रम जान जाओगे। श्रीरामजी के चरणों में तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो। अपने मन में तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरि की कृपा से उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी।
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥ १ ॥
अर्थ:
जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञान के लिये श्रम (साधन) करते हैं, वे मूर्ख घर में खड़ी हुई कामधेनु को छोड़कर दूध के लिये मदार के पेड़ को खोजते फिरते हैं।