इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई
चौपाई ८, दोहा ११८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई॥ बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी॥ ८ ॥
अर्थ
इन्द्रियों और उनके देवताओं को ज्ञान [स्वाभाविक ही] नहीं सुहाता; क्योंकि विषय-भोगों में सदा ही उनकी प्रीति रहती है। और बुद्धि को भी विषयरूपी हवा ने बावली बना दिया। तब फिर (दुबारा) उस ज्ञानदीपक को उसी प्रकार से कौन जलावे?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा ११८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा