जिमि थल बिनु जल रहि न

चौपाई ३, दोहा ११९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥ तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥ ३ ॥

अर्थ

जैसे स्थल के बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकार के उपाय क्यों न करे। वैसे ही, हे पक्षिराज! सुनिए, मोक्षसुख भी श्रीहरि की भक्ति को छोड़कर नहीं रह सकता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

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ज्ञान और भक्ति की महिमा