गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर
गरुड़जी जीवन, धर्म और साधना से जुड़े सात महत्वपूर्ण प्रश्न पूछते हैं। काकभुशुण्डि उनके उत्तरों में आध्यात्मिक मार्ग का सार प्रकट करते हैं।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण १९ / २१
प्रकरण पाठ
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥ काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥ ६ ॥
अर्थ:
ऐसे मनुष्य-शरीर को धारण करके भी जो लोग श्रीहरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं।
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई॥ खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥ ९ ॥
अर्थ:
किन्तु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और [उन्हें बाँधने के लिये] अपनी खाल कढ़वाकर विपत्ति सहते हुए मर जाते हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं।
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥ दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥ १० ॥
अर्थ:
वे परायी सम्पत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे चन्द्रमा के प्रकाश में ओले गलकर नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का उदय जगत् के दुःख के लिये ही होता है, जैसे प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु का उदय।
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई॥ द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥ १२ ॥
अर्थ:
शिव और गुरु की निन्दा करनेवाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निन्दा करनेवाला व्यक्ति बहुत-से नरक भोगकर फिर जगत् में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है।
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥ होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥ १३ ॥
अर्थ:
जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निन्दा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निन्दा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये अस्त हो गया रहता है।
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥ बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥ १६ ॥
अर्थ:
यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जायँ) तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनतासे प्राप्त होनेवाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं; उनके नाम कौन जानता है (अर्थात् वे अपार हैं)।