गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर

गरुड़जी जीवन, धर्म और साधना से जुड़े सात महत्वपूर्ण प्रश्न पूछते हैं। काकभुशुण्डि उनके उत्तरों में आध्यात्मिक मार्ग का सार प्रकट करते हैं।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १९ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥ नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥ १ ॥

अर्थ:

पक्षिराज गरुड़जी फिर प्रेमसहित बोले--हे कृपालु ! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखानकर कहिये।

चौपाई

प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥ बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचारकर संक्षेप में ही कहिये।

चौपाई

संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥ कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥ ३ ॥

अर्थ:

संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिये। फिर कहिये कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन-सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है?

चौपाई

मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥ तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर मानस-रोगों को समझाकर कहिये। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है। [काकभुशुण्डिजी ने कहा--] हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेम के साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ।

चौपाई

नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥ नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥ ५ ॥

अर्थ:

मनुष्य-शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देनेवाला है।

चौपाई

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥ काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥ ६ ॥

अर्थ:

ऐसे मनुष्य-शरीर को धारण करके भी जो लोग श्रीहरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं।

चौपाई

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥ ७ ॥

अर्थ:

जगत् में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलन के समान जगत् में सुख नहीं है। और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है।

चौपाई

संत सहहिं दुख पर हित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी॥ भूर्ज तरू सम संत कृपाला। पर हित निति सह बिपति बिसाला॥ ८ ॥

अर्थ:

संत दूसरों की भलाई के लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिये। कृपालु संत भूर्जतरु के समान दूसरों के हित के लिये भारी विपत्ति सहते हैं।

चौपाई

सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई॥ खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥ ९ ॥

अर्थ:

किन्तु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और [उन्हें बाँधने के लिये] अपनी खाल कढ़वाकर विपत्ति सहते हुए मर जाते हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं।

चौपाई

पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥ दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥ १० ॥

अर्थ:

वे परायी सम्पत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे चन्द्रमा के प्रकाश में ओले गलकर नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का उदय जगत् के दुःख के लिये ही होता है, जैसे प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु का उदय।

चौपाई

संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥ परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥ ११ ॥

अर्थ:

और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय विश्वभर के लिये सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है।

चौपाई

हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई॥ द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥ १२ ॥

अर्थ:

शिव और गुरु की निन्दा करनेवाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निन्दा करनेवाला व्यक्ति बहुत-से नरक भोगकर फिर जगत् में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है।

चौपाई

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥ होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥ १३ ॥

अर्थ:

जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निन्दा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निन्दा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये अस्त हो गया रहता है।

चौपाई

सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥ सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥ १४ ॥

अर्थ:

जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुःख पाते हैं।

चौपाई

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥ काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥ १५ ॥

अर्थ:

सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है।

चौपाई

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥ बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥ १६ ॥

अर्थ:

यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जायँ) तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनतासे प्राप्त होनेवाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं; उनके नाम कौन जानता है (अर्थात् वे अपार हैं)।

चौपाई

ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥ पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥ १७ ॥

अर्थ:

ममता दाद है, ईर्ष्या खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की बहुताई है। पराये सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है।

चौपाई

अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥ तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी॥ १८ ॥

अर्थ:

अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार की ईषनाएँ भयानक तिजारी हैं।

चौपाई

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका॥ १९ ॥

अर्थ:

मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ।

दोहा

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि। पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥ १२१ (क) ॥

अर्थ:

एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शान्ति) को कैसे प्राप्त करे?

दोहा

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान। भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥ १२१ (ख) ॥

अर्थ:

नियम, धर्म, आचार, तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परन्तु हे हरिजान! उनसे ये रोग नहीं जाते।