यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न

दोहा ११६ (क) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ॥ ११६ (क) ॥

अर्थ

श्रीरघुनाथजी का यह रहस्य (गुप्त मर्म) जल्दी कोई भी नहीं जान पाता। श्रीरघुनाथजी की कृपा से जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्न में भी मोह नहीं होता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का दोहा ११६ (क) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

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ज्ञान और भक्ति की महिमा