पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त
पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त
दोहा ११५ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर॥ ११५ (क) ॥
अर्थ
परन्तु जो वैराग्यवान् और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्री को त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयों के वश में हैं (उनके गुलाम हैं) और श्रीरघुवीर के चरणों से विमुख हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का दोहा ११५ (क) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा