भोजन करिअ तृपिति हित लागी

चौपाई ५, दोहा ११९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥ असि हरि भगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई॥ ५ ॥

अर्थ

जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्ति के लिये और उस भोजन को जठराग्नि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टा के) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ११९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
ज्ञान और भक्ति की महिमा