सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा
चौपाई १, दोहा ११८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥ आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥ १ ॥
अर्थ
'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखण्ड (तैलधारावत् कभी न टूटनेवाली) वृत्ति है वही [उस ज्ञानदीपक की] परम प्रचण्ड दीपशिखा (लौ) है। [इस प्रकार] जब आत्मानुभव के सुख का सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद-भ्रम का नाश हो जाता है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा