सो मायाबस भयउ गोसाईं
सो मायाबस भयउ गोसाईं
चौपाई २, दोहा ११७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥ जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥ २ ॥
अर्थ
हे गोसाईं! वह मायाके वशीभूत होकर तोते और वानरकी भाँति अपने-आप ही बाँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतन में ग्रन्थि (गाँठ) पड़ गयी। यद्यपि वह ग्रन्थि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटने में कठिनता है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा