बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ
दोहा १२० (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि॥ १२० (ख) ॥
अर्थ
वैराग्यरूपी ढाल से अपने को बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवार से मद, लोभ और मोहरूपी वैरियों को मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज! इसे विचारकर देखिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का दोहा १२० (ख) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा