माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ
चौपाई २, दोहा ११६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ॥ पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी॥ २ ॥
अर्थ
आप सुनिये, माया और भक्ति-ये दोनों ही स्त्रीवर्ग की हैं, यह सब कोई जानते हैं। फिर श्रीरघुवीर को भक्ति प्यारी है। माया बेचारी तो निश्चय ही नाचनेवाली (नटिनीमात्र) है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा