परम धर्ममय पय दुहि भाई
परम धर्ममय पय दुहि भाई
चौपाई ७, दोहा ११७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै॥ ७ ॥
अर्थ
हे भाई! इस प्रकार (धर्माचार में प्रवृत्त सात्त्विकी श्रद्धारूपी गौ से भाव, निवृत्ति और वश में किये हुए निर्मल मन की सहायतासे) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्नि पर भलीभाँति औटावे। फिर क्षमा और संतोषरूपी हवा से उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम (मन का निग्रह)-रूपी जामन देकर उसे जमावे।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा