राम भगति मनि उर बस जाकें
राम भगति मनि उर बस जाकें
चौपाई ५, दोहा १२० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥ चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥ ५ ॥
अर्थ
श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत् में वे ही मनुष्य चतुरों के शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणि के लिये भलीभाँति यत्न करते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
ज्ञान और भक्ति की महिमा