प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई
चौपाई ३, दोहा १२० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई॥ खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं॥ ३ ॥
अर्थ
[उसके प्रकाश से] अविद्या का प्रबल अन्धकार मिट जाता है। पतंगों का सारा समूह हार जाता है। जिसके हृदय में भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा