ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर

दोहा १२० (क) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं॥ १२० (क) ॥

अर्थ

ब्रह्म (वेद) समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्र को मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिरूपी मधुरता बसी रहती है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का दोहा १२० (क) है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
ज्ञान और भक्ति की महिमा