तेइ तृन हरित चरै जब गाई
तेइ तृन हरित चरै जब गाई
चौपाई ६, दोहा ११७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥ नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा॥ ६ ॥
अर्थ
उन्हीं [ धर्माचाररूपी] हरे तृणों (घास) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़े को पाकर वह पेन्हावे। निवृत्ति (सांसारिक विषयों से और प्रपंच से हटना) नोई (गौ के दूहते समय पिछले पैर बाँधने की रस्सी) है, विश्वास [दूध दुहने का] बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है (अपने वश में है), दुहनेवाला अहीर है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ११७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।
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ज्ञान और भक्ति की महिमा