अति दुर्लभ कैवल्य परम पद

चौपाई २, दोहा ११९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥ राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआईं॥ २ ॥

अर्थ

संत, पुराण, निगम और आगम सब यह कहते हैं कि कैवल्य रूप परम पद अत्यन्त दुर्लभ है; किन्तु हे गोसाईं! वही [अत्यन्त दुर्लभ] मुक्ति श्रीरामजी को भजने से बिना इच्छा किए भी जबरदस्ती आ जाती है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
ज्ञान और भक्ति की महिमा