छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई

चौपाई ३, दोहा ११८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई॥ छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया॥ ३ ॥

अर्थ

यदि वह (विज्ञानरूपिणी बुद्धि) उस गाँठ को खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो। परन्तु हे पक्षिराज गरुड़जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेक विघ्न करती है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “ज्ञान और भक्ति की महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ज्ञान, भक्ति और ज्ञानदीपक के प्रतीक द्वारा भक्ति की सहज महिमा का वर्णन है।

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ज्ञान और भक्ति की महिमा