गौर सरीर स्याम मन माहीं
गौर सरीर स्याम मन माहीं
चौपाई ४, दोहा २७७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं॥ सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मोही॥ ४ ॥
अर्थ
यह शरीर से गोरा, पर हृदय का बड़ा काला है। यह विषमुख है, दुधमुहा नहीं। स्वभाव से ही टेढ़ा है, तेरा अनुसरण नहीं करता (तेरे जैसा शीलवान् नहीं है)। यह नीच मुझे काल के समान नहीं देखता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद