भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी
चौपाई ३, दोहा २७३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥ सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥ ३ ॥
अर्थ
भृगुसुत समझकर और जनेऊ देखकर तो जो कुछ आप कहते हैं, उसे मैं क्रोध को रोककर सह लेता हूँ। देवता, महिषुर, हरिजन और गौ--इन पर हमारे कुल में वीरता नहीं दिखायी जाती।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २७३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद