करौं काह मुख एक प्रसंसा
करौं काह मुख एक प्रसंसा
चौपाई ३, दोहा २८५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥ अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता॥ ३ ॥
अर्थ
मैं एक मुख से आपकी क्या प्रशंसा करूँ? हे महादेवजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस! आपकी जय हो। मैंने अनजान में आपको बहुत-से अनुचित वचन कहे। हे क्षमा-मंदिर दोनों भाई! मुझे क्षमा कीजिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद