सुखु बिदेह कर बरनि न जाई
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई
चौपाई २, दोहा २८६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई॥ बिगत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी॥ २ ॥
अर्थ
जनक जी के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता; मानो जन्म का दरिद्री धन का खजाना पा गया हो! सीता जी का भय जाता रहा; वे ऐसी सुखी हुईं जैसे चन्द्रमा के उदय से चकोर की कन्या सुखी होती है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद